समानार्थी शब्द माखी - मक्खी गुड – ശര്ക്കര गडि - सट रहना हाथ मलै - पश्चाताप करना सिर धुनै - തല തല്ലിക്കരയുക सरीस – शरीर मुई – मरी , नष्ट होना सनेह – स्नेह जौ - लौ - जब-तक माहुर- विष मेह – मेघ पारद – mercury पावक – सूर्य परकाजित हित – दूसरोँ के हित के लिए तरवारी - तलवार आँच – ജ്വാല सँचहि - इक्कट्ठा करना
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Showing posts from November 8, 2011
दसवीं कक्षा के लिए - कबीर,तुलसी और रहीम के दोहे और सारंश
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कबीरदास माखी गुड में गडि रही, पंख रह् यो लिपटाय । हाथ मलै और सिर धुनै, लालच बुरी बलाय ।। माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया सरीर । आसा तृष्णा न मुई, यौ कहि गया कबीर ।। पानी बाढै नाव में घर में बाढै दाम । दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम ।। तुलसीदास काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौ मन में खान । तौ लौ पंडित मुरखौ, तुलसी एक समान ।। आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह । तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह ।। मिथ्या माहुर सज्जनहि, खलहिं गरल सम साँच । तुलसी छुवत पराई ज्यो, पारद पावक-आँच । रहीम तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान । कहि रहिम परकाज हित, संपति सँचहिं सुजान ।। रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिए डारि । जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि ।। दोहे का आशय कबीर दास कबीर कहते हैं - मक्खी गुड़ से सटकर इस तरह बैठ जाती है कि उसका पंख गुड़ से लिपट रहता है। लालच को मिटाना बिलकुल असंभव है। ( लालच बुरी आदत है।) माया की वजह से तन मन दोनोँ की बुरी हालत हो जाती है।इसलिए अभिलाषाओं को जड़ से मिटाना चाहिए, वरना वे मन और तन पर कब्जा कर लेंगी। (माया और तृष्णा का नाश नहीं ह...
आचार्य द्रोण और एकलव्य
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आचार्य द्रोण राजकुमारों को धनुर्विद्या की विधिवत शिक्षा प्रदान करने लगे। उन राजकुमारों में अर्जुन के अत्यन्त प्रतिभावान तथा गुरुभक्त होने के कारण वे द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। द्रोणाचार्य का अपने पुत्र अश्वत्थामा पर भी विशेष अनुराग था इसलिये धनुर्विद्या में वे भी सभी राजकुमारों में अग्रणी थे, किन्तु अर्जुन अश्वत्थामा से भी अधिक प्रतिभावान थे। एक रात्रि को गुरु के आश्रम में जब सभी शिष्य भोजन कर रहे थे तभी अकस्मात् हवा के झौंके से दीपक बुझ गया। अर्जुन ने देखा अन्धकार हो जाने पर भी भोजन के कौर को हाथ मुँह तक ले जाता है। इस घटना से उन्हें यह समझ में आया कि निशाना लगाने के लिये प्रकाश से अधिक अभ्यास की आवश्यकता है और वे रात्रि के अन्धकार में निशाना लगाने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया। गुरु द्रोण उनके इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त प्रसन्न हुये। उन्होंने अर्जुन को धनुर्विद्या के साथ ही साथ गदा, तोमर, तलवार आदि शस्त्रों के प्रयोग में निपुण कर दिया।