एक कविता
फूल अौ काँटा
हैं जन्म लेते जगह में एक ही ,
एक ही पौधा उन्हें है पालता
रात में उन पर चमकता चांद भी ,
एक ही सी चांदनी है डालता ।
मेह उन पर है बरसता एक सा ,
एक सी उन पर हवाएँ हैं बहीं
पर सदा ही यह दिखाता है हमें ,
ढंग उनके एक से होते नहीं ।
छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ ,
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार - डूबी तितलियों का पर कतर ,
भँवर का है भेद देता श्याम तन ।
फूल लेकर तितलियों को गोद में
भँवर को अपना अनूठा रस पिला ,
निज सुगन्धों और निराले ढंग से
है सदा देता कली का जी खिला ।
है खटकता एक सबकी आँख में
दूसरा है सोहता सुर शीश पर ,
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे जो किसी में हो बड़प्पन की कसर ।