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Showing posts from November 20, 2010

एक कविता

फूल अौ काँटा हैं जन्म लेते जगह में एक ही , एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चांद भी , एक ही सी चांदनी है डालता । मेह उन पर है बरसता एक सा , एक सी उन पर हवाएँ हैं बहीं पर सदा ही यह दिखाता है हमें , ढंग उनके एक से होते नहीं । छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ , फाड़ देता है किसी का वर वसन प्यार - डूबी तितलियों का पर कतर , भँवर का है भेद देता श्याम तन । फूल लेकर तितलियों को गोद में भँवर को अपना अनूठा रस पिला , निज सुगन्धों और निराले ढंग से है सदा देता कली का जी खिला । है खटकता एक सबकी आँख में दूसरा है सोहता सुर शीश पर , किस तरह कुल की बड़ाई काम दे जो किसी में हो बड़प्पन की कसर ।