दसवीं कक्षा के लिए - कबीर,तुलसी और रहीम के दोहे और सारंश
कबीरदास
माखी गुड में गडि रही, पंख रह् यो लिपटाय ।
हाथ मलै और सिर धुनै, लालच बुरी बलाय ।।
माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया सरीर ।
आसा तृष्णा न मुई, यौ कहि गया कबीर ।।
पानी बाढै नाव में घर में बाढै दाम ।
दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम ।।
तुलसीदास
काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौ मन में खान ।
तौ लौ पंडित मुरखौ, तुलसी एक समान ।।
आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह ।
तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह ।।
मिथ्या माहुर सज्जनहि, खलहिं गरल सम साँच ।
तुलसी छुवत पराई ज्यो, पारद पावक-आँच ।
रहीम
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान ।
कहि रहिम परकाज हित, संपति सँचहिं सुजान ।।
रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिए डारि ।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि ।।
दोहे का आशय
कबीर दास
कबीर कहते हैं - मक्खी गुड़ से सटकर इस तरह बैठ जाती है कि उसका पंख गुड़ से लिपट रहता है। लालच को मिटाना बिलकुल असंभव है।
( लालच बुरी आदत है।)
माया की वजह से तन मन दोनोँ की बुरी हालत हो जाती है।इसलिए अभिलाषाओं को जड़ से मिटाना चाहिए, वरना वे मन और तन पर कब्जा कर लेंगी।
(माया और तृष्णा का नाश नहीं होता।)
नाव में पानी बढ़ें तो नाव डूब जाएगी।घर में धन-धौलत बढ़ें तो घर का नाश हो जाएगा।नाव में पानी बढ़ना और घर में संपत्ति का बढ़ना दोनों बराबर है।इसलिए दोनों हाथों से पानी बाहर निकाल देना चाहिए। सज्जनों का यही सुचिंतित काम है।
(अधिक धन दूसरों में बाँटना है।)
तुलसीदास
जब-तक मन काम,क्रोध,मद,लोभ का खजाना बना रहता है तब-तक पंडित और मूर्ख दोनों बराबर हैं।उपर्य़ुक्त दुर्गुणों से पंडित भी मूर्खों जैसे व्यवहार करते रहेंगे ।
(दुर्गुणों और बुरे मनोविचारों से पंडित भी मूर्ख बनता है।)
आगंतुकों का सम्मान करना शिष्टाचार का बुनियादी तत्व है।अगर किसी को आते देखकर कोई प्रसन्न नहीं होता, उसकी आँखोंमें प्रेम का प्रकाश नहीं झलकता तो उसके घर न जाना ही बेहतर है।
(आगंतुकों का सम्मान करना शिष्टाचार का बुनियादी तत्व है)
सज्जनों के लिए मिथ्या विष के समान है और दुर्जनों के लिए सत्य ज़हर जैसा। दूसरों को छूने पर ऎसा ही असर पारस को पावक की गरमी को छूने से होता है। पारद (mercury)आग से लगने पर जल जाता है।
रहीम
पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते और सरोवर अपना पानी खुद नहीं पीता।
बड़ों को देखकर छोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार कुछ भी नहीं कर सकती।सुई का धर्म सुई ही निभा सकती है, तलवार नहीं।
माखी गुड में गडि रही, पंख रह् यो लिपटाय ।
हाथ मलै और सिर धुनै, लालच बुरी बलाय ।।
माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया सरीर ।
आसा तृष्णा न मुई, यौ कहि गया कबीर ।।
पानी बाढै नाव में घर में बाढै दाम ।
दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम ।।
तुलसीदास
काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौ मन में खान ।
तौ लौ पंडित मुरखौ, तुलसी एक समान ।।
आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह ।
तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह ।।
मिथ्या माहुर सज्जनहि, खलहिं गरल सम साँच ।
तुलसी छुवत पराई ज्यो, पारद पावक-आँच ।
रहीम
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान ।
कहि रहिम परकाज हित, संपति सँचहिं सुजान ।।
रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजिए डारि ।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि ।।
दोहे का आशय
कबीर दास
कबीर कहते हैं - मक्खी गुड़ से सटकर इस तरह बैठ जाती है कि उसका पंख गुड़ से लिपट रहता है। लालच को मिटाना बिलकुल असंभव है।
( लालच बुरी आदत है।)
माया की वजह से तन मन दोनोँ की बुरी हालत हो जाती है।इसलिए अभिलाषाओं को जड़ से मिटाना चाहिए, वरना वे मन और तन पर कब्जा कर लेंगी।
(माया और तृष्णा का नाश नहीं होता।)
नाव में पानी बढ़ें तो नाव डूब जाएगी।घर में धन-धौलत बढ़ें तो घर का नाश हो जाएगा।नाव में पानी बढ़ना और घर में संपत्ति का बढ़ना दोनों बराबर है।इसलिए दोनों हाथों से पानी बाहर निकाल देना चाहिए। सज्जनों का यही सुचिंतित काम है।
(अधिक धन दूसरों में बाँटना है।)
तुलसीदास
जब-तक मन काम,क्रोध,मद,लोभ का खजाना बना रहता है तब-तक पंडित और मूर्ख दोनों बराबर हैं।उपर्य़ुक्त दुर्गुणों से पंडित भी मूर्खों जैसे व्यवहार करते रहेंगे ।
(दुर्गुणों और बुरे मनोविचारों से पंडित भी मूर्ख बनता है।)
आगंतुकों का सम्मान करना शिष्टाचार का बुनियादी तत्व है।अगर किसी को आते देखकर कोई प्रसन्न नहीं होता, उसकी आँखोंमें प्रेम का प्रकाश नहीं झलकता तो उसके घर न जाना ही बेहतर है।
(आगंतुकों का सम्मान करना शिष्टाचार का बुनियादी तत्व है)
सज्जनों के लिए मिथ्या विष के समान है और दुर्जनों के लिए सत्य ज़हर जैसा। दूसरों को छूने पर ऎसा ही असर पारस को पावक की गरमी को छूने से होता है। पारद (mercury)आग से लगने पर जल जाता है।
रहीम
पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते और सरोवर अपना पानी खुद नहीं पीता।
बड़ों को देखकर छोटों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जहाँ सुई काम आती है वहाँ तलवार कुछ भी नहीं कर सकती।सुई का धर्म सुई ही निभा सकती है, तलवार नहीं।
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